दिल्ली: चंबल का नाम आते ही अक्सर लोगों के जेहन में डकैतों और बागियों की कहानियां आती हैं। मध्य प्रदेश के इसी इलाके से निकलकर देव प्रभाकर सिंह तोमर ने अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने पहले IIT की परीक्षा पास की और इसके बाद UPSC की कठिन परीक्षा में भी सफलता हासिल की।

सरकारी रिकॉर्ड में उनके दादा को चंबल के डकैत के तौर पर दर्ज किया गया है। हालांकि प्रभाकर और उनका परिवार उन्हें डकैत नहीं बल्कि बागी के तौर पर याद करता है। संघर्ष से भरे परिवार की पृष्ठभूमि से निकलकर प्रभाकर ने शिक्षा को अपनी राह बनाया।

चंबल के संघर्ष से शुरू हुई सफलता की कहानी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रभाकर ने हाल ही में एक इंटरव्यू में अपने जीवन के सफर के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उनकी कहानी सिर्फ IIT और UPSC की सफलता तक सीमित नहीं है। इसकी शुरुआत उनके दादा और पिता के संघर्ष से होती है।
प्रभाकर के मुताबिक उनके दादा का उस समय सरकारी अधिकारियों के साथ कई बार विवाद हुआ था। इसके बाद उन्होंने बागी का रास्ता अपना लिया। परिवार ने आर्थिक परेशानियों का दौर भी देखा। कई बार घर चलाना तक मुश्किल हो जाता था।
इसके बाद प्रभाकर के पिता ने अपनी जिंदगी बदलने का फैसला किया। वह गांव छोड़कर ग्वालियर चले गए। वहां उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और बाद में शिक्षक बन गए। पिता के शिक्षक बनने के बाद परिवार की स्थिति धीरे-धीरे बेहतर होने लगी।

पिता ने बदली परिवार की दिशा
प्रभाकर ने भी पढ़ाई को अपने भविष्य का रास्ता बनाया। उन्होंने पांचवीं कक्षा तक मध्य प्रदेश बोर्ड से पढ़ाई की। इसके बाद उनका दाखिला CBSE बोर्ड में हो गया।
शुरुआत में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई करना उनके लिए आसान नहीं था। उन्हें काफी परेशानी हुई लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने खुद को नए माहौल के अनुसार ढाल लिया।

11वीं में देखा IIT का सपना
प्रभाकर ने बताया कि 11वीं कक्षा में उनके स्कूल के दोस्त IIT की तैयारी करने की बात करते थे। इसी दौरान उनके मन में भी IIT करने का विचार आया।उन्होंने तैयारी शुरू की और पहले ही प्रयास में IIT की परीक्षा पास कर ली। इसके बाद उन्हें IIT रोपड़ में दाखिला मिला। यहां से उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की।

विदेश की नौकरी छोड़ी तो UPSC बना अगला लक्ष्य
पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रभाकर नौकरी के लिए नीदरलैंड चले गए। वहां उन्होंने फिलिप्स कंपनी में काम किया। हालांकि नौकरी में उनका मन नहीं लगा और इसी दौरान उन्होंने UPSC की तैयारी करने का फैसला किया।
UPSC की तैयारी के लिए प्रभाकर नीदरलैंड से भारत लौट आए। दिल्ली में उन्होंने शिक्षक की नौकरी करते हुए सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की।

दो बार मिली नाकामी फिर तीसरे प्रयास में सफलता
UPSC की राह उनके लिए आसान नहीं रही। पहले दो प्रयासों में उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने तैयारी जारी रखी और अपनी कोशिश नहीं छोड़ी।आखिरकार तीसरे प्रयास में उन्हें सफलता हासिल हुई। UPSC 2025 में प्रभाकर ने ऑल इंडिया रैंक 629 हासिल की।

अब रेल मंत्रालय में दे रहे हैं सेवाएं
UPSC में सफलता के बाद प्रभाकर का चयन इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस यानी IRTS के लिए हुआ। फिलहाल वह रेल मंत्रालय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।चंबल के संघर्ष से शुरू हुई यह कहानी शिक्षा और लगातार मेहनत के जरिए आगे बढ़ने का उदाहरण बन गई है।