राजस्थान में निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद अब अगली लड़ाई बोर्ड और मेयर-सभापति पद को लेकर है। कई निकायों में बीजेपी और कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से दूर हैं। ऐसे में चुनाव जीतने वाले निर्दलीय पार्षदों की अहमियत अचानक बढ़ गई है। दोनों दल अपने-अपने समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं । और इसी बीच पार्षदों की बाड़ाबंदी की खबरों ने स्थानीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। कई जगह दोनों प्रमुख दल अपने पार्षदों को एकजुट रखने के लिए होटल और रिजॉर्ट में ठहरा रहे हैं।

अलवर से अजमेर तक निर्दलीयों पर नजर

अलवर नगर निगम के 65 वार्डों में बीजेपी ने 28 और कांग्रेस ने 23 सीटें जीती हैं। 13 निर्दलीय और एक BSP प्रत्याशी भी जीता है। बहुमत के लिए 33 पार्षद चाहिए। यानी दोनों प्रमुख दलों के लिए बाकी पार्षदों का समर्थन अहम है। चुनाव से पहले ही बीजेपी और कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों को एकजुट रखने की कवायद शुरू कर दी थी।
अजमेर में कांग्रेस 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है। बीजेपी को 32 और निर्दलीयों को 11 सीटें मिली हैं। 80 सदस्यीय निगम में बहुमत के लिए 41 वोट चाहिए। कांग्रेस ने पांच निर्दलीय पार्षदों के समर्थन का दावा किया है। वहीं पाली में कांग्रेस के 29, बीजेपी के 21 और निर्दलीयों के 15 पार्षद हैं।

जोधपुर में बराबरी, बीकानेर में कांग्रेस को बहुमत

जोधपुर नगर निगम में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने 44-44 सीटें जीती हैं। 100 सदस्यीय निगम में 11 सीटें अन्य के खाते में गई हैं। दूसरी ओर बीकानेर में कांग्रेस ने 42 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया है, जबकि बीजेपी के 27 और अन्य के 11 पार्षद हैं।

चर्चा में ‘बाड़ाबंदी’ और ‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’

चुनाव के बाद अलवर और जयपुर समेत कई जगहों पर पार्षदों को होटल और रिजॉर्ट में रखे जाने की रिपोर्ट सामने आई है। अलवर में कांग्रेस के पार्षदों को होटल में जुटाया गया था, जबकि बीजेपी ने भी अपने प्रत्याशियों को अलग स्थान पर रखा था।
इस बीच नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने अलवर में पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने कांग्रेस पार्षदों पर दबाव बनाए जाने का आरोप लगाया। दूसरी ओर, कांग्रेस की तरफ से पार्षदों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगाए गए हैं, जबकि बीजेपी ने ऐसे आरोपों को खारिज किया है।
अब राजस्थान की स्थानीय राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन निकायों में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, वहां निर्दलीय और अन्य पार्षद किसके साथ जाते हैं। कई जगह यही समर्थन बोर्ड गठन का पूरा गणित बदल सकता है।