यानी चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही दोनों दलों के बीच सीटों का गणित सिरदर्द बन गया है।
कांग्रेस का सीधा हिसाब
सूत्रों की मानें तो कांग्रेस की दावेदारी के पीछे 2017 का विधानसभा चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव है। 2017 में सपा और कांग्रेस ने साथ चुनाव लड़ा था और कांग्रेस को 100 से ज्यादा सीटों पर मैदान में उतारा गया था।
2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा । कांग्रेस इन सब को आधार बनाकर ज्यादा सीटें चाहती है। पार्टी तैयारी भी उसी हिसाब से करती दिख रही है। कांग्रेस की तरफ से यूपी की सभी 403 विधानसभा सीटों पर संगठन खड़ा करने और चुनावी तैयारी की बात कही जा चुकी है।
मतलब साफ है-कांग्रेस बातचीत की मेज पर कमजोर दावेदार बनकर बैठना नहीं चाहती।
सपा का गणित बिल्कुल अलग है
सपा का संदेश फिलहाल यह है कि सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने से गठबंधन मजबूत नहीं होगा।
पार्टी करीब 40 से 50 सीटों के आसपास कांग्रेस को देने के फॉर्मूले पर विचार करती बताई जा रही है। हालांकि यह अंतिम फैसला नहीं है।
सीट बंटवारे के लिए सपा का पैमाना यह है कि जिस सीट पर कांग्रेस टिकट चाहती है, वहां उसका उम्मीदवार कितना मजबूत है? यानी सपा सीटों की गिनती से ज्यादा सीट-दर-सीट चुनावी ताकत देखना चाहती है।
कहां से शुरू होता है असली टकराव ?
कांग्रेस का तर्क है कि ज्यादा सीटें मिलेंगी तो संगठन भी मजबूत होगा और चुनावी विस्तार का मौका मिलेगा। वहीं सपा का सवाल है कि अगर सीट जीतने की स्थिति में नहीं है तो सिर्फ संख्या बढ़ाने का फायदा क्या? यही वह जगह है जहां दोनों पार्टियों के राजनीतिक हित टकरा रहे हैं।
2022 के आंकड़े सपा को बड़ा तर्क देते हैं
सपा के पास अपना दावा मजबूत करने के लिए 2022 का चुनाव रिजल्ट है। उस चुनाव में सपा ने 111 सीटें जीती थीं। कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई थी।
सपा के लिए यह आंकड़ा बेहद अहम है। पार्टी के नजरिए से सवाल उठता है कि पिछली विधानसभा में जिस पार्टी की मौजूदगी इतनी सीमित रही, उसे 100 से ज्यादा सीटें क्यों दी जाएं?
सीटों से ज्यादा अब सीटों की लोकेशन मायने रखेगी
यूपी में 403 विधानसभा सीटें हैं। लेकिन गठबंधन की राजनीति में 50 सीट और 70 सीट के बीच का अंतर जितना बड़ा दिखता है, उससे ज्यादा बड़ा सवाल यह है कि इनमें कौन-कौन सी सीटें शामिल होंगी।
रायबरेली, अमेठी समेत अपने प्रभाव वाले अन्य पर कांग्रेस की दावेदारी महत्वपूर्ण हो सकती है। ऐसे में सपा भी अपनी मजबूत सीटें आसानी से छोड़ने के मूड में नहीं होगी।
सबसे अहम बात यही है कि अभी सीटों का बंटवारा तय नहीं हुआ है। इसलिए फिलहाल 50 या 100 में से किसी एक आंकड़े को अंतिम सीट फॉर्मूला मानना सही नहीं होगा।
लेकिन इतना तय है कि 2027 की लड़ाई से पहले सपा-कांग्रेस के रिश्ते की पहली बड़ी परीक्षा शुरू हो चुकी है।
कांग्रेस सीटों के जरिए अपना राजनीतिक विस्तार चाहती है और सपा गठबंधन को अपनी मौजूदा ताकत के हिसाब से चलाना चाहती है। ऐसे में अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी होंगी कि कौन कितना पीछे हटता है और कौन अपनी सीटों पर समझौता करने को तैयार होता है।