सवाल इसलिए अहम है क्योंकि चंद्रशेखर आजाद अब सिर्फ दलित राजनीति तक सीमित रहने की कोशिश करते दिखाई नहीं दे रहे हैं। उनकी राजनीति में एक ऐसी स्वतंत्र बहुजन पहचान बनाने की कोशिश नजर आती है, जिसमें दलितों के साथ ओबीसी और मुस्लिम समुदायों को भी जोड़ा जा सके । 


पहली सूची से चंद्रशेखर की रणनीति के संकेत

31 जुलाई को आजाद समाज पार्टी ने 2027 की तैयारी के के लिए 45 विधानसभा सीटों पर प्रभारियों की पहली सूची जारी की थी । इसमें 18 एससी, 16 ओबीसी, 10 मुस्लिम और एक सिख चेहरे को जगह दी गई। इन्हे पार्टी का उम्मीदवार भी बनाए जाने की संभावना जताई जा रही है।
यानी चंद्रशेखर का संदेश केवल इतना नहीं है कि दलितों को एक राजनीतिक मंच चाहिए, बल्कि यह भी है कि बहुजन राजनीति को एक अलग राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा किया जा सकता है। 2024 लोकसभा चुनाव में नगीना से उनकी जीत ने इस दावे को चुनावी जमीन भी दी। 

यहीं से अखिलेश के PDA की चुनौती शुरू होती है

2024 में समाजवादी पार्टी के यूपी से चुने गए 37 सांसदों में 20 ओबीसी, आठ एससी और चार मुस्लिम समुदाय से थे। यानी PDA का सामाजिक प्रतिनिधित्व महज नारा नहीं रहा, बल्कि टिकट और चुनावी नतीजों में भी दिखाई दिया।
 अब चंद्रशेखर इसी सामाजिक स्पेस में अपनी स्वतंत्र जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले चुनाव में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कौन कितने दलित वोट हासिल करता है, बल्कि यह भी होगा कि दलित, ओबीसी और मुस्लिम मतदाताओं का कितना हिस्सा किसी एक बड़े गठबंधन के बजाय स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प के साथ जाता है।

बीजेपी और मायावती का फैक्टर भी अहम

बीजेपी के लिए भी यह समीकरण महत्वपूर्ण है। उसकी रणनीति में गैर-यादव ओबीसी और दलित सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिखाई देता है। दूसरी तरफ बसपा प्रमुख मायावती ने 2027 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान किया है। ऐसे में दलित वोटों की लड़ाई और दिलचस्प हो जाती है। मायावती अगर अपना पुराना वोट बैंक काफी हद तक बचाए रखती हैं और चंद्रशेखर भी दलित वोटों में सेंध लगाते हैं, तो PDA का सामाजिक आधार बंट सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि बसपा का वोट सीधे बीजेपी के खाते में जाएगा, लेकिन करीबी मुकाबलों में वोटों का यह बंटवारा बीजेपी के लिए फायदा पैदा कर सकता है। इसलिए बीजेपी की नजर सिर्फ मायावती पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी होगी कि दलित वोट सपा, बसपा और चंद्रशेखर के बीच कितना बंटता है। 

क्या चंद्रशेखर अखिलेश से कर सकते हैं हार्ड बारगेन?

अखिलेश यादव के लिए दलित प्रतिनिधित्व और गैर-यादव पिछड़ी जातियों के बीच विस्तार आने वाले चुनाव में अहम मुद्दा बन सकता है। वहीं चंद्रशेखर के सामने चुनौती यह है कि मायावती की मौजूदगी के बीच वह दलित राजनीति में अपनी स्वतंत्र जगह कितनी तेजी से मजबूत कर पाते हैं।
अगर पार्टी अपने सामाजिक आधार को विस्तार देने में सफल रहती है तो भविष्य में चंद्रशेखर गठबंधन या सीट बंटवारे की स्थिति में अखिलेश यादव से बड़ी राजनीतिक सौदेबाजी कर सकते हैं ।