इसी बीच, अरविंद केजरीवाल ने 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित प्रदर्शन में अपने परिवार के साथ शामिल होने का ऐलान किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चुनाव आयोग के खिलाफ इस लड़ाई में राहुल गांधी 'शो-स्टॉपर' बन गए हैं? और क्या उनकी बढ़ती चर्चा ने विपक्ष के दूसरे नेताओं के सामने अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की चुनौती खड़ी कर दी है?
क्या अखिलेश यादव और केजरीवाल भी इस मुद्दे पर अपनी अलग मौजूदगी दर्ज कराना चाहते हैं? हालांकि, इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, लेकिन हाल के घटनाक्रम ने विपक्षी राजनीति में नई बहस जरूर छेड़ दी है।
राहुल गांधी की अत्यधिक सक्रियता से क्यों उठे सवाल?
6 अक्टूबर को INDIA ब्लॉक के कई दलों के नेताओं ने संसद से चुनाव आयोग के कार्यालय की ओर मार्च किया। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे कई नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने आकाशवाणी भवन के पास धरना जारी रखा।
इस घटनाक्रम में राहुल और प्रियंका को खूब चर्चा मिली। लेकिन बताया जाता है कि विपक्षी खेमे में यह सवाल उठा कि साझा प्रदर्शन की पहचान केवल कांग्रेस के दो नेताओं तक क्यों सिमट गई। राजनीतिक हलकों में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे की नाराजगी की चर्चा है। आम आदमी पार्टी के सौरभ भारद्वाज ने भी राहुल और प्रियंका की रील और मीडिया कवरेज को लेकर सवाल उठाए थे ।
केजरीवाल की एंट्री से क्या बदलेगा सियासी समीकरण?
अरविंद केजरीवाल ने 10 अक्टूबर को CJP के प्रदर्शन में परिवार के साथ शामिल होने की घोषणा की है। उन्होंने लोगों से भी बड़ी संख्या में पहुंचने की अपील की। AAP सांसद संजय सिंह ने स्पष्ट किया कि प्रदर्शन CJP आयोजित कर रही है, लेकिन पार्टी के लोग इसमें शामिल होंगे।
CJP और AAP के संबंधों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। संगठन से जुड़े कुछ लोगों के पुराने राजनीतिक जुड़ाव के कारण इसे आम आदमी पार्टी के करीब बताया जाता है। अब केजरीवाल और उनकी पार्टी जिस तरह से सक्रिय हुई है , उसको लेकर भी खूब चर्चा हो रही है ।
चुनाव आयोग का मुद्दा या विपक्ष में नेतृत्व की लड़ाई?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और SIR के विरोध ने विपक्षी दलों को एक साझा मुद्दा दिया है। लेकिन प्रदर्शन में राहुल गांधी की बढ़ती चर्चा, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे के खेमे की सीमित भागीदारी और अब केजरीवाल की सक्रियता ने विपक्षी एकजुटता और राजनीतिक श्रेय को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या विपक्ष साझा मुद्दे पर एकजुट रह पाएगा, या हर दल अपनी राजनीतिक पहचान और हिस्सेदारी को लेकर अलग रणनीति अपनाएगा? आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि प्रदर्शन में कौन-कौन से दल कितनी सक्रियता दिखाते हैं और क्या वे मिलकर आंदोलन को आगे बढ़ाते हैं। फिलहाल, चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध के साथ विपक्ष के भीतर नेतृत्व और क्रेडिट की बहस भी तेज हो गई है।



