लखनऊ। उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर सपा-कांग्रेस गठबंधन की तस्वीर अभी बनी भी नहीं है और दरारों की रेखाएं दिखने लगी हैं। बंद कमरों में बात नहीं बन पाई तो अब सड़कों और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए जोर-आजमाइश हो रही है। सीटों पर दावेदारी से लेकर एक-दूसरे के सियासी गढ़ में दस्तक तक, दोनों दलों के बीच अब खुले में खींचतान चल रही है।

कांग्रेस ने 150 सीटों का दावा ठोककर पहली चाल चल दी है, तो सपा ने भी ‘सीट चाहिए तो कैंडिडेट बताओ’ का पेंच फंसा दिया है । यानी सीट शेयरिंग की मेज पर अब सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी नहीं चलेगी। कांग्रेस को जिन सीटों पर दावा करना है, वहां संभावित उम्मीदवार और उसकी जमीनी ताकत का हिसाब भी देना होगा। गठबंधन की बात अपनी जगह है, लेकिन दोनों दल जिस तरह अपने-अपने पत्ते खोल रहे हैं, उससे साफ है कि 2027 की लड़ाई से पहले सीटों को लेकर रस्साकशी और बढ़ने वाली है।

बात यहीं तक नहीं रुकती। रायबरेली से शुरू हुई PDA यात्रा, कन्नौज-सैफई को लेकर कांग्रेस की जवाबी प्रतिक्रिया और पश्चिमी यूपी में नेताओं की बयानबाजी बता रही है कि गठबंधन की बातचीत के साथ-साथ दोनों दल अपनी-अपनी जमीन भी नाप रहे हैं। एक तरफ कांग्रेस का 150 का दावा है, दूसरी तरफ सपा की ‘कैंडिडेट बताओ, सीट लो’ वाली कसौटी। अब असली सवाल यही है कि सीट शेयरिंग की मेज पर संख्या चलेगी या उम्मीदवार का दम?

कांग्रेस ने 150 का आंकड़ा क्यों सामने रखा?

कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने साफ कहा है कि 2027 विधानसभा चुनाव के लिए सीट शेयरिंग पर फैसला अक्टूबर में होने की उम्मीद है और कांग्रेस 150 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के पास प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों के लिए उम्मीदवार उपलब्ध हैं।

यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि अब तक सीटों को लेकर अटकलें थीं, लेकिन कांग्रेस ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर एक बड़ा आंकड़ा सामने रख दिया है। कांग्रेस का तर्क है कि गठबंधन में उसकी हिस्सेदारी पर्याप्त होनी चाहिए और पार्टी प्रदेश की हर विधानसभा सीट पर अपनी तैयारी कर रही है। यानी बातचीत अब इस आधार पर नहीं होगी कि कांग्रेस को कुछ चुनिंदा सीटें देकर गठबंधन का हिस्सा बना दिया जाए।

सपा का जवाब—सीट चाहिए तो उम्मीदवार भी दिखाइए

सपा की तरफ से सीट शेयरिंग को लेकर जो फॉर्मूला सामने आया है, उसमें कांग्रेस से उन सीटों की सूची देने को कहा गया है जिन पर वह चुनाव लड़ना चाहती है। साथ ही संभावित उम्मीदवारों के नाम और उनकी राजनीतिक ताकत का आकलन यानि चुनाव जीतने की उसकी क्षमता को पैमाना बनाने की बात कही गई है । 

यानी सपा का सवाल सीधा है कि संबंधित चुनाव क्षेत्र में उम्मीदवार का वजन कितना है?कांग्रेस के लिए यही सवाल असहज करने वाला हो सकता है क्योंकि सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग के साथ उसे उन सीटों पर अपना संगठन और उम्मीदवार भी दिखाने होंगे।

टकराव की वजह - 150 बनाम ‘जिताऊ’

यूपी में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं। कांग्रेस 150 से नीचे जाने को तैयार नहीं होने का संदेश दे रही है। दूसरी ओर सपा की बातचीत में सीटों की संख्या से ज्यादा जोर इस बात पर है कि जिस सीट पर दावा किया जा रहा है, वहां गठबंधन का उम्मीदवार चुनावी तौर पर कितना मजबूत है। यहीं दोनों दलों की रणनीति अलग दिखाई देती है।

कांग्रेस ज्यादा सीटों के जरिए अपना संगठन और राजनीतिक विस्तार चाहती है। सपा चाहती है कि सीटों का बंटवारा ऐसा हो जिसमें हर सीट पर जीत की संभावना को प्राथमिकता मिले।
कागज पर दोनों बातें एक साथ चल सकती हैं। लेकिन चुनावी मैदान में जब एक ही सीट पर दोनों दलों का दावा सामने आएगा, तब असली परीक्षा शुरू होगी।

रायबरेली से शुरू हुई यात्रा ने बढ़ाई बेचैनी

इस खींचतान के बीच अखिलेश यादव ने 24 सितंबर को रायबरेली से PDA रथ यात्रा शुरू की। रायबरेली कांग्रेस और गांधी परिवार से जुड़ा महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षेत्र है। फिलहाल राहुल गांधी वहां से सांसद हैं । ऐसे में जब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने यहीं से अपने अभियान को आगे बढ़ाने का फैसला किया तो कांग्रेस को अखरना स्वाभाविक था ।

सपा की तरफ से इसे PDA राजनीति को जमीन पर उतारने के अभियान के तौर पर पेश किया गया, लेकिन गठबंधन की राजनीति में रायबरेली का चयन अलग सवाल भी खड़े करता है । 
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अगर अखिलेश यादव रायबरेली जा सकते हैं तो कांग्रेस भी कन्नौज और सैफई जा सकती है।
यानी बात एक यात्रा से निकलकर सीधे एक-दूसरे के राजनीतिक प्रभाव वाले इलाकों तक पहुंच गई।

पश्चिमी यूपी में सीटों का पेच और ज्यादा उलझा

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी दोनों दलों की दावेदारी आसान नहीं है। पश्चिमी यूपी की करीब 60 मुस्लिम-बहुल सीटों पर दोनों पार्टियों की नजर है। कांग्रेस इन क्षेत्रों में अधिक हिस्सेदारी चाहती है, जबकि सपा इन्हें अपने मजबूत राजनीतिक आधार का हिस्सा मानती है।

यही वजह है कि पश्चिमी यूपी में नेताओं की बयानबाजी को केवल व्यक्तिगत बयान नहीं माना जा सकता है । सीट शेयरिंग में जिन इलाकों पर दोनों पार्टियां मजबूत दावा कर रही हैं, वहां स्थानीय नेताओं की सक्रियता सीधे सीटों की बातचीत पर असर डाल सकती है।

इसी कड़ी में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और सपा सांसद इकरा हसन के बयानों ने भी दोनों दलों के बीच चल रही खींचतान को सार्वजनिक किया । दिलचस्प बात यह है कि दोनों पार्टियां एक-दूसरे के साथ गठबंधन की बात करते हुए भी अपनी अलग चुनावी मशीनरी तैयार कर रही हैं।

सपा 403 विधानसभा सीटों पर संगठन, जातीय समीकरण, स्थानीय फीडबैक और संभावित उम्मीदवारों को लेकर काम कर रही है। कांग्रेस भी पीछे नहीं है। पार्टी ने अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की है। यानी दोनों पार्टियां बातचीत की मेज पर बैठने से पहले अपना-अपना होमवर्क कर रही हैं।

2024 का साथ, 2027 में नया हिसाब

सपा और कांग्रेस ने 2024 का लोकसभा चुनाव यूपी में साथ लड़ा था। इस गठबंधन में सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 लोकसभा सीटें जीती थीं। लेकिन विधानसभा का चुनाव अलग तरह का खेल है। लोकसभा की एक सीट के भीतर कई विधानसभा क्षेत्र आते हैं। विधानसभा चुनाव में हर सीट पर स्थानीय उम्मीदवार, संगठन, जातीय समीकरण और बूथ स्तर की ताकत अलग होती है। इसीलिए 2024 की सफलता को सीधे 2027 के सीट शेयरिंग फॉर्मूले में बदलना आसान नहीं है।

हालांकि अखिलेश यादव ने गठबंधन के साथ आगे बढ़ने की बात कही है। लेकिन सीटों पर सार्वजनिक दावे और नेताओं की बयानबाजी यह बता रही है कि समझौते की जमीन पर खींचतान बढ़ रही है।


अब अक्टूबर पर टिकी नजर

कांग्रेस ने सीट शेयरिंग का फैसला अक्टूबर में होने की संभावना जताई है। इसलिए आने वाला महीना इस खींचतान के लिहाज से अहम है। अगर दोनों दल अपने दावों के बीच कोई व्यावहारिक फॉर्मूला निकाल लेते हैं तो मौजूदा बयानबाजी गठबंधन के भीतर की सामान्य मोलभाव प्रक्रिया साबित होगी।

लेकिन अगर सीटों की संख्या, उम्मीदवार और प्रभाव वाले क्षेत्रों पर दूरी बनी रहती है, तो यही सार्वजनिक बयानबाजी आगे और तेज हो सकती है। फिलहाल तस्वीर यही है कि गठबंधन की बात दोनों तरफ से कायम है, लेकिन सीटों की मेज पर दोनों की कुर्सियां अभी एक-दूसरे से काफी दूर हैं।