दिल्ली: कश्मीर से वापस लौट रहे एक युवक ने हवाई यात्रा के महंगे किराए से बचने के लिए ट्रेन के फर्स्ट एसी यानी 1AC में टिकट बुक किया। उसे उम्मीद थी कि 1AC में सफर आरामदायक और सुकून भरा होगा, लेकिन उसका अनुभव बिल्कुल अलग निकला।
युवक के मुताबिक, कोच में बच्चों के शोर और यात्रियों के खर्राटों की वजह से वह रातभर ठीक से सो नहीं पाया। महंगा टिकट लेने के बावजूद उसे वह आराम नहीं मिल सका, जिसकी उसने उम्मीद की थी।
अपने अनुभव को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए युवक ने कहा कि उसके लिए वंदे भारत का सफर 1AC से बेहतर रहा। इसके बाद सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर बहस शुरू हो गई।
कुछ लोगों ने यात्री की परेशानी को सही बताया, तो कुछ यूजर्स ने कहा कि ट्रेन में अलग-अलग तरह के यात्रियों के साथ ऐसी स्थिति बन सकती है और 1AC को पूरी तरह शांत और निजी सफर की गारंटी नहीं माना जा सकता। 

पूजा ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर करते हुए बताया कि उनका 29 साल का दोस्त रोहित कश्मीर घूमने के बाद बेंगलुरु वापस लौट रहा था। सीधे फ्लाइट से आने का किराया 22 हजार रुपये से ज्यादा था। इतने महंगे किराए से बचने के लिए रोहित ने दिल्ली से ट्रेन पकड़ने और 1AC में सफर करने का फैसला किया।
उसे लगा था कि फर्स्ट एसी का टिकट लेने के बाद सफर आरामदायक रहेगा। कम यात्री होंगे, शांति मिलेगी और रात में आराम से नींद भी आ जाएगी। लेकिन ट्रेन में चढ़ने के बाद उसका यह अनुमान गलत साबित हुआ।

अपर बर्थ मिली और रातभर नहीं मिली नींद 

पूजा के मुताबिक, रोहित को चार्ट बनने के बाद अपर बर्थ मिली। हालांकि उसे इससे ज्यादा परेशानी नहीं थी, क्योंकि उसे उम्मीद थी कि 1AC में कम से कम शोर-शराबा नहीं होगा।
लेकिन रात होते ही कहानी बदल गई। केबिन में मौजूद बच्चे लगातार शोर करते रहे। वहीं, एक सह-यात्री के तेज खर्राटों ने उसकी नींद और मुश्किल कर दी।
परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई। दूसरे केबिन से एक बच्चे के लगातार रोने की आवाज भी आती रही। रोहित इतना परेशान हो गया कि उसे लगा कि जाकर कहे कि बच्चे को थोड़ा संभाल लें, क्योंकि बाकी यात्री भी रात में आराम करने के लिए सफर कर रहे हैं।
मिली जानकारी के अनुसार रोहित ने बनाया नया नियम 
पूजा की पोस्ट के अनुसार, इस पूरे अनुभव के बाद रोहित ने तय किया कि वह अकेले 5 घंटे से ज्यादा का ट्रेन सफर नहीं करेगा।
उसका कहना है कि जब महंगा 1AC टिकट लेने के बाद भी आराम से सोना मुश्किल हो जाए, तो लंबी दूरी के लिए वंदे भारत या चेयर कार ज्यादा बेहतर विकल्प लगते हैं।
रोहित का यह अनुभव सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। कुछ लोगों ने उसकी परेशानी को समझा, तो कुछ ने कहा कि ट्रेन में बच्चों का शोर या किसी यात्री के खर्राटे जैसी चीजों को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है।