दोनों नेताओं ने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के 19 अक्टूबर के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी न्यायिक हिरासत दो दिन और बढ़ाई गई थी। हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर अंतिम फैसला देने के बजाय उन्हें पहले उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया अपनाने की सलाह दी। इसके बाद याचिकाकर्ताओं के वकील ने अदालत से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार कर लिया गया।
हाईकोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा कि जब मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ रिवीजन पिटीशन दाखिल करने का विकल्प उपलब्ध है, तो सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका क्यों दाखिल की गई।
अदालत ने यह भी कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन कानून में उपलब्ध उचित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। न्यायमूर्ति ने सुझाव दिया कि दोनों नेता पहले SEM कोर्ट में होने वाली कार्यवाही का इंतजार करें और जरूरत पड़ने पर निर्धारित कानूनी उपाय अपनाएं।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) के खिलाफ प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। आरोप है कि सौरव दास और आशुतोष रांका ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति नहीं होने के बावजूद वहां पहुंचने और सुरक्षा बैरिकेड पार करने का प्रयास किया।
इससे पहले दोनों नेताओं को शांति बनाए रखने के लिए 50,000 रुपये के बॉन्ड की शर्त पर रिहा किया गया था। अधिकारियों का आरोप है कि बाद में उन्होंने बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया। इसी आधार पर उनके खिलाफ कार्रवाई की गई।
14 अक्टूबर को उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। 19 अक्टूबर को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने हिरासत दो दिन और बढ़ाने का आदेश दिया। दोनों नेताओं ने इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
जमानतदारों को लेकर भी विवाद
मामले में पहले पेश किए गए जमानतदारों की उपयुक्तता पर भी सवाल उठे थे। SEM कोर्ट के आदेश के अनुसार, दस्तावेजों में तस्वीरों और पहचान संबंधी विवरणों को लेकर विसंगतियां थीं। इसलिए नए जमानतदार पेश करने को कहा गया था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि जमानतदारों को अस्वीकार करने और हिरासत बढ़ाने के लिए पर्याप्त आधार दर्ज नहीं किए गए। अदालत ने इन मुद्दों पर अंतिम निर्णय देने के बजाय उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाने की बात कही।



