अदालत ने यह भी कहा कि निर्धारित प्रदर्शन स्थलों के इस्तेमाल के लिए एक निश्चित समय अवधि होनी चाहिए, ताकि सभी समूहों को अपनी मांग उठाने का मौका मिल सके। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब दिल्ली में जंतर-मंतर पर हुए बड़े विरोध प्रदर्शनों के कारण आसपास के कारोबार और आम लोगों की आवाजाही प्रभावित होने की शिकायतें सामने आई हैं।
'एक ही जगह पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं किया जा सकता'
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि कोई भी संगठन यह नहीं कह सकता कि वह अभी प्रदर्शन कर रहा है, इसलिए दूसरे लोग वहां प्रदर्शन नहीं कर सकते। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर एक समूह किसी जगह पर लगातार बैठा रहेगा तो किसान, वकील और दूसरे प्रदर्शनकारी अपनी बात रखने कहां जाएंगे?
मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी का संदेश साफ था कि प्रदर्शन का अधिकार केवल किसी एक संगठन तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में अलग-अलग समूहों को अपनी समस्याएं और मांगें सामने रखने का अवसर मिलना चाहिए। इसके लिए प्रदर्शन स्थलों का इस्तेमाल व्यवस्थित तरीके से होना जरूरी है।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर शुरू हुआ विवाद
यह मामला दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल में हुए बड़े विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। पिछले महीने विपक्षी दलों और अन्य संगठनों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन किया था। यह विरोध चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े आरोपों को लेकर किया गया था।
इस प्रदर्शन के दौरान राजधानी के मध्य हिस्से में यातायात और कारोबार प्रभावित होने की शिकायतें सामने आईं। इसके बाद व्यापारिक संगठनों ने भी अदालत का रुख किया। व्यापारियों की ओर से दलील दी गई कि लंबे समय तक चलने वाले प्रदर्शनों से आसपास की दुकानों और व्यावसायिक गतिविधियों पर असर पड़ता है।
व्यापारियों ने अदालत में उठाया कारोबार प्रभावित होने का मुद्दा
सुनवाई के दौरान व्यापारियों के वकील ने अदालत को बताया कि प्रदर्शन स्थल के आसपास करीब 50 लाख लोग रहते हैं। उनका दावा था कि लगातार विरोध प्रदर्शनों के कारण दुकानों पर ग्राहकों की आवाजाही कम हो गई और कई कारोबार प्रभावित हुए।
व्यापारिक संगठनों ने त्योहारों के समय प्रदर्शन के कारण होने वाली परेशानियों का मुद्दा भी उठाया। किराना कमेटी दिल्ली की ओर से दायर याचिका में त्योहारों के दौरान प्रदर्शन रोकने की मांग की गई है।
हालांकि, अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले में सभी संबंधित प्रदर्शनकारी संगठनों को भी पक्षकार बनाना जरूरी होगा। अदालत ने याचिकाकर्ताओं से प्रदर्शन आयोजित करने वाले संगठनों को मामले में शामिल करने को कहा।
केंद्र सरकार ने भी रखी अपनी बात
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जो संगठन प्रदर्शन का आह्वान करते हैं, उन्हें अपने आयोजन के परिणामों की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए।
अदालत के सामने यह सवाल भी था कि प्रदर्शन की अनुमति देते समय प्रशासन को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अनुमति देने या मना करने के आदेश में उसके कारण स्पष्ट होने चाहिए। यानी प्रदर्शन की अनुमति से जुड़े फैसले बिना वजह या अस्पष्ट तरीके से नहीं लिए जाने चाहिए।
जंतर-मंतर की जगह अब कहां हो सकते हैं प्रदर्शन?
दिल्ली में प्रदर्शन स्थलों को लेकर पहले से बदलाव किए जा चुके हैं। अक्टूबर 2026 में दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का आदेश जारी किया था। इसके बाद प्रदर्शन के लिए तीन वैकल्पिक जगहों की पहचान की गई।
इनमें रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और शाहदरा का CBD ग्राउंड शामिल हैं। ऐसे में अब दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के आयोजन को लेकर प्रशासन की अनुमति और निर्धारित स्थानों की भूमिका अहम हो गई है।
क्या प्रदर्शन के अधिकार पर रोक लगाना चाहती है अदालत?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को प्रदर्शन के अधिकार पर पूर्ण रोक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार प्राप्त है।
हालांकि, यह अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरे नागरिकों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए प्रशासन उचित और कानूनी प्रतिबंध लगा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में भी कहा था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन प्रदर्शन को इस तरह नियंत्रित किया जाना चाहिए कि आसपास रहने वाले लोगों को अनावश्यक परेशानी न हो। वहीं, 2020 के शाहीन बाग मामले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक सड़कों और स्थानों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करके प्रदर्शन नहीं किया जा सकता।
फिलहाल सुनवाई जारी, अंतिम आदेश का इंतजार
मंगलवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन स्थलों के इस्तेमाल, अलग-अलग संगठनों को अवसर देने और आम लोगों को होने वाली परेशानी जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। लेकिन अभी इन टिप्पणियों को देशभर के सभी प्रदर्शन स्थलों के लिए लागू की गई नई समय-सीमा या अंतिम न्यायिक आदेश नहीं माना जाना चाहिए।
मामले में आगे की सुनवाई और अदालत के आदेश से यह स्पष्ट होगा कि दिल्ली में प्रदर्शन स्थलों के इस्तेमाल के लिए समय सीमा और अनुमति की व्यवस्था को लेकर क्या दिशा-निर्देश दिए जाते हैं।



