NOIDA NEWS: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) द्वारा जारी किए गए उन आदेशों (नोटिस) को निरस्त (Set Aside) कर दिया है, जिनके माध्यम से सोसायटियों में मेंटेनेंस शुल्क की कटौती पर रोक लगाने और बिजली आपूर्ति बहाल रखने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद सहित पूरे प्रदेश की हजारों अपार्टमेंट सोसायटियों और एओए (Apartment Owners Association) को बड़ी राहत मिली है।
आरजी रेजीडेंसी एओए के अधिवक्ता अजय गुप्ता एवं ऋषिकांत राय ने बताया कि एसोसिएशन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष यह पक्ष रखा था कि सोसाइटी में पीवीवीएनएल (PVVNL) द्वारा 'सिंगल पॉइंट' (Single Point) बिजली कनेक्शन दिया गया है। व्यक्तिगत फ्लैटों में लगे मीटर कोई अलग प्रीपेड मीटर नहीं हैं, बल्कि वे डिस्प्ले मीटर हैं। सोसाइटी में बिजली की खपत और कॉमन एरिया मेंटेनेंस (CAM) शुल्क सहित अन्य शुल्कों की कटौती किसी स्टैंडअलोन प्रीपेड मीटर से नहीं, बल्कि सोसाइटी प्रबंधन के एक कंपोजिट सॉफ्टवेयर (Composite Software) के माध्यम से की जाती है। जब कोई निवासी अपना खाता रिचार्ज करता है, तो सॉफ्टवेयर स्वचालित रूप से मेंटेनेंस शुल्क और बिजली की वास्तविक खपत का समायोजन कर लेता है।
कुछ डिफॉल्टर निवासी, जो अन्य नियमित भुगतान करने वाले निवासियों की कीमत पर मेंटेनेंस शुल्क दिए बिना मुफ़्त सुविधाओं का आनंद लेना चाहते थे और सोसाइटी को नुकसान पहुँचा रहे थे, उन्हें अदालत से कड़ा झटका लगा है। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और विद्युत निगम से सख्त सवाल किए कि यदि मेंटेनेंस शुल्क की वसूली रोक दी जाएगी, तो सोसाइटी अपना प्रबंधन और रखरखाव कैसे चलाएगी?
आरजी रेजीडेंसी के पूर्व सचिव अविनाश अरुण और निवासियों ने इस फैसले पर खुशी जताते हुए कहा कि यह एओए और पारदर्शी मेंटेनेंस व्यवस्था की बड़ी जीत है।
अब कोई भी बिजली निगम के आदेशों की आड़ लेकर मेंटेनेंस रोकने और सोसाइटी को नुकसान पहुँचाने की हिम्मत नहीं करेगा।
गौरतलब है कि पीवीवीएनएल अपने व्यावसायिक लाभ के लिए सोसायटियों को 'सिंगल पॉइंट' से 'मल्टी पॉइंट' (Multi-Point) कनेक्शन में बदलने के लिए दबाव बना रहा था।
देखा गया है कि मल्टी-पॉइंट कनेक्शनों में लोग बिजली का बिल तो चुका देते हैं, लेकिन मेंटेनेंस शुल्क रोक लेते हैं, जिससे "नो लॉस-नो प्रॉफिट" (No Loss, No Profit) के सिद्धांत पर चलने वाली सोसायटियों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है।